Tuesday, 22 September 2015

गालिब का शेर अर्ज है, कान के पास यूं न शोर मचाओ ए जालिमों...

डॉक्टर : तुम पागल कैसे हुए?  पागल : मैंने एक विधवा से शादी की, उसकी जवान बेटी से मेरे बाप ने शादी कर ली। इस तरह मेरा बाप मेरा दामाद बन गया और मेरी बेटी मेरी मां बन गई। उनके घर बेटी हुई तो वो मेरी बहन हुई, पर मैं उसकी नानी का शौहर था, इसलिए वो मेरी नवासी भी हुई। इसी तरह मेरा बेटा अपनी दादी का भाई बन गया, और मैं अपने बेटे का भांजा और मेरा बेटा अपने दादा का साला बन गया और....  डॉक्टर : चुप कर स्साले... तू मुझे भी पागल करेगा क्या...    शायर टाइप के मित्र से हमने कहा : आज गालिब का कोई शेर सुना दो भाई।  मित्र बोला : ये लीजिए जनाब, चचा गालिब का शेर अर्ज है :  कान के पास यूं न शोर मचाओ ए जालिमों...  बड़ी मुद्दतों के बाद सोया है ‘मीर' अभी।  मैंने कहा, ‘भैया ये गालिब का नहीं मीर का शेर है।’  वो बोला : तुम नी समझोगे भिया, मीर तो सो रिया है, तो शेर कैसे लिखेगा। शेर गालिब ने ही लिखा है! 

Unknown

Author & Editor

Has laoreet percipitur ad. Vide interesset in mei, no his legimus verterem. Et nostrum imperdiet appellantur usu, mnesarchum referrentur id vim.

0 comments:

Post a Comment

 
biz.